(रमेश बत्तरा के कृतित्त्व पर आधारित अशोक भाटिया द्वारा संपादित पुस्तक)

इन दिनों लघुकथा का बिगुल बज रहा है| चहुँ ओर इसका महिमामंडन हो रहा है| पत्र- पत्रिकाओं में भी इसके खूब दर्शन हो रहे हैं , पुस्तकों में छाप छोड़ी जा रही है पर एक समय था जब गद्य- पद्य की मुख्य विधाओं की उप विधाओं या कह लीजिए उसकी सहायक स्वतंत्र इकाइयों ने नवीन आकार लेने शुरू ही किए थे और वे अपने सिंचन- पल्लवन हेतु माली रचनाकार को जोह रही थीं…. विष्णु प्रभाकर, हरिशंकर परसाई, सतीश दुबे, युगल,रमेश बत्तरा,भगीरथ आदि ऐसे ही रोपक और सिंचक माली थे जिन्होंने कहानी की स्वतंत्र इकाई लघुकथा को अंकुर से पौधा उसके आधुनिक रूप में ढालकर बनाया| उसके रचनात्मक स्वरूप को निखारा और उसे घास- फूँक सरीखी चुटकुलेबाजी से भी दूर रखा| लघुकथा के विकास में रमेश बत्तरा की बहुआयामी महत्त्वपूर्ण रचनात्मक भूमिका रही है।
हर्ष का विषय है कि लघुकथाओं की दुनिया के वर्तमान एक देदीप्यमान सितारे ने एक अस्त हुए सितारे को फिर से साहित्यकार में नव आभासित कर दिया।
अशोक भाटिया जी के संपादन में सद्य प्रकाशित ‘ सवाल- दर – सवाल’ ने कथा की नीलाभ में लघुकथा का पीताभमय ऐसा रंग बिखेरा कि सवाल- दर- सवाल जो उठ रहे थे कि लघुकथा का सृजनात्मक ऐतिहासिक विकासक्रम क्या हो, उसका वास्तविक संरचनात्मक स्वरूप क्या माना जाए और साथ ही भावुक हृदयी एक लेखक की संवेगात्मक- संवेदनात्मक नियति क्या हो…. अनेक सवालों के जवाब इस पुस्तक से अनुशोधित किए जा सकते हैं|
जब कोई पादप पनपता है जिसके बीज तो पूर्ववर्ती कालखंड में ही अपने निशान छोड़ चुके होते हैं किंतु वर्तमान के नव सृजन नव काल चेतना को जब संजोता है और विशाल वटवृक्ष बनता है तो उसके प्रथम सिंचन करने वाले माली लोग विशेष होते हैं क्योंकि वे न केवल रोपते हैं पौधा बल्कि बिना यह सोचे कि कब- किसको फल देगा, या फलवान बनेगा कि नहीं , वे अपनी भूमिका निष्पक्षत: निभाते चले जाते हैं।
मूलत: कथाकार रमेश बत्तरा जी हिंदी साहित्य सेवा से वर्षों तक जुड़े रहे| न केवल लेखन अपितु सारिका, नवभारत टाइम्स व संडे मेल जैसे तत्कालीन नामी गिरामी प्रकाशनों के संपादक भी रहे| हिंदी की ही रोटी उन्होंने खाई|
संपूर्ण जीवन परिचय तो हम इस पुस्तक से जान ही सकते हैं, साथ ही एक लेखक और उसकी लेखनी की धार को भी आत्मसात कर सकते हैं| एक लेखक वही बन सकता है जो दिल का अच्छा हो, संवेदनशील हो पर यह भी सत्य है कि निजत्व से कृतित्व महान होता है। निज पीड़ा संग परपीड़ा जब हृदय को मथती है तब जो आह्लाद की खोज होती है और जो विसंगतियों, अभावों, सुख- दुख के क्षणों की अनुभूति होती है, सहृदयी को लिखने पर मजबूर कर देती है कि पाठक भी उससे साक्षी हो सके और सृजन की वो साम्यता- असाम्यता उसे भी सुख- दुख की अनुभूति अपने स्तर पर होती है| पिघलते मोम के दर्द का परिष्करण उसके जलने/ गलने में ही है… रोशनी का सृजक..
पुस्तक के प्रारंभिक खंड में उनके अंतरंग मित्रों और परिजनों के संस्मरणात्मक आठ आलेख दिए गए हैं | इन्हें पढ़कर लेखक की फक्कड़ यायावरी- सी प्रवृत्ति लगी| काश! उन्होंने और जीवन को समग्रतापूर्ण मायनों में जिया होता तो साहित्य- सीपी में से अनमोल मोती और निकलते|
‘मत अभिमत’ अनुभाग में जया रमेश के संस्मरण के अलावा प्रो. फूलचंद मानव, सुशील राजेश, अशोक जैन, बलराम, भगीरथ, सुभाष नीरव, अशोक भाटिया के आलेख/संस्मरण/टिप्पणियाँ ने उनके चरित्र को खूब उभारा किंतु उनके व्यक्तित्व व कृतित्व को संपूर्ण समझना है तो अगले खंड ‘ रचना संसार’ में दी गई 24 लघुकथाएँ ही पर्याप्त भर हैं
उनकी भावों की अनुभूति पर, रूपकों पर, शब्दों के वाग्जाल पर अद्भुत सुंदर संयोजनात्मक पकड़ है| उनके शब्द जीवन के यथार्थ अनुभवों से और अंतरात्मा से निकलते हैं|
उनकी भावों की फसल ऐसी है कि जिसमें घास- फूँक को तनिक भी जगह नहीं। लेखनी विशुद्ध को बुनती है| एक- एक लघुकथा उनकी तीव्र और सूक्ष्म दृष्टि के विश्लेषणात्मक कौशल को बयान करती है| इनमें से कुछेक ( सिर्फ एक, सूअर, कहूँ कहानी, लड़ाई, सिर्फ हिंदुस्तान में और शीशा) अंतर्जाल व लघुकथा संग्रहों में पहले भी पढ़ी हैं|
ये वस्तुत: व्यक्ति के ज़ेहन को न सिर्फ झकझोरती हैं बल्कि उसे भौंचक्का भी कर देती हैं। बलराम जी ने ठीक ही लिखा है, “रमेश ने तो भारत से बाहर जा बसे हिंदुस्तानियों की ज़हनियत को भी झकझोरने का काम किया, वह भी लघुकथा जैसी विधा के जरिए रमेश की लघुकथा ‘सिर्फ हिंदुस्तान’ पढ़कर हम इस विधा की शक्ति और सामर्थ्य का अनुमान लगा सकते हैं, जो विदेश से आए एक भारतीय को भारतीयता के दर्शन ही नहीं कराती, इसके प्रति उसे नतमस्तक भी कर देती है। रमेश की एक और लघुकथा ‘खोया हुआ आदमी’ पढ़कर लगता है कि जैसे यह लघुकथा उसने अपने आप पर लिखी है।”
उनकी लघुकथाओं में वैयक्तिकता के साथ समष्टि के प्रति जिम्मेदारी का भाव भी प्रकट है|
समग्र के संपादक गौरीनंदन सिंघल के साथ उनका विस्तृत साक्षात्कार भी इस पुस्तक में उपलब्ध है जिससे लघुकथाओं संबंधी अनेक भ्रांतियों से पर्दा उठ जाता है | बत्तरा जी के दृष्टिकोण में लघुकथा का औचित्य कहानी की पूरकता में है | यह कथा साहित्य की ही एक स्वतंत्र इकाई है| कथा का कथ्य बहुमुखी है तो उसे विस्तृत रूप दे दिया जाता है और कथ्य किसी एक मन: स्थिति अथवा क्षण के व्यवहार आदि की ओर संकेत करता है तो थोड़े में लिख लिया| लघुकथा में आजकल चुटकुलेबाजी बहुत हो रही है, उससे बचना चाहिए|
उनका विश्वास है कि जो कथ्य थोड़े में लिखे जाने की माँग करता है उसकी शब्द संख्या भी 25 से 1000 शब्दों तक हो सकती है
रमेश बत्तरा जी के कथ्य प्रतीकात्मक , अभिव्यंजनात्मक और सांकेतिक हैं। स्वयं की खोज में जूझता आदमी भी वहांँ परिलक्षित होता है| खोज , खोया हुआ आदमी, नागरिक आदि लघुकथाओं का शिल्प बहुत आकर्षक है| यूँ तो सभी लघुकथाओं का विषय आम आदमी और उसका संघर्ष है किंतु वजह, दुआ, बीच बाज़ार और लड़ाई आदि में यथार्थ और कल्पना सजीव हो उठे हैं। समाज के निम्न व मध्यमवर्गीय किरदारों को उन्होंने बखूबी उभारा है| पुष्ट परिकल्पना और बेजोड़ प्रतिभा का अद्भुत संयोग ‘सूअर’ कारखाने में काम करने वाला मजदूर, ‘ नौकरी’ का बाबू राम सराय, ‘ दुआ’ का स्कूटरवाला, ‘ नागरिक’ का निरंजन और उसका दोस्त ‘स्वाद’ के रिक्शाचालक, ‘बीच बाजार’ की स्त्रियांँ अनुभवी का भीख मांँगता व्यक्ति ये सभी निम्न और मध्यम वर्ग के लोग हैं जो लेखक की जन संवेदना तथा जन पक्षधरता के प्रमाण हैं। कथ्य इन्हीं लोगों के दुख तकलीफ और संघर्षों को अभिव्यक्त करते हैं। अशोक जी ने उन पर शोधात्मक लेखनी चलाई है और उनके लेख – ” रमेश बत्तरा: लघुकथा की रचनात्मक धारा के प्रतीक” में उनके समस्त रचना संसार को पढ़ा- समझा जा सकता है। उन्होंने विस्तार से लिखा है कि कब कहांँ, किस पत्रिका में उनकी लघु कथाएंँ प्रकाशित हुई हैं, यह गहन विवेचन द्रष्टव्य है| लघुकथा संबंधी बत्तरा जी का समस्त चिंतन व मान्यता इसमें निहित है| सांप्रदायिक समस्या को केंद्र में रखकर बुनी गई लघुकथाएंँ दुआ, सूअर, वजह, राम- रहमान हैं। माँएँ और बच्चे, हालात, खोज, अनुभवी आर्थिक विपन्नता से जूझते आम आदमी की कहानी भी देखी जा सकती हैं| प्रशासनिक क्षेत्र बोध कराती तीन बेहतरीन लघुकथाएंँ हैं- नागरिक, निजाम और नौकरी| हिंसा के विरोध में लिखवाने थाने गये एक नागरिक को ही पुलिस खून- खराबा करने के जुर्म में गुनहगार ठहरा देती है| दफ्तरी जीवन की पैंतरेबाज़ी निजाम और आम आदमी की विवशता व जीवंतता ‘ नौकरी’ में देखी जा सकती है| बाल मनोविज्ञान की झलक ‘ नई जानकारी’, राष्ट्र चेतना ‘ सिर्फ हिंदुस्तान में’ है| ‘ शीशा’ में
बाजारवाद का घर संसार पर पड़ता प्रभाव और उससे भटकती नयी पीढ़ी को देखा जा सकता है | फैशनेबल नारी की मानसिकता को दर्शाता है | ‘संदर्भ ‘ में बदलते सांस्कृतिक मूल्यों और चारित्रिक हनन की त्रासदी के संदर्भ में देखा जा सकता है | लड़ाई में देशभक्त पत्नी पति के शहीद होने पर बंदूक को बगल में लिटाकर मानो अपनी श्रद्धांजलि देती है। विदाई के वे पल रुला देते हैं।
बत्तरा जी की लघुकथाओं की मुझे यह भी विशेष बात लगी कि इनके संवाद बोलते हैं। कम शब्दों में आगा- पीछा सब समझा देते हैं| बहुव्रीहि सामासिकता श्रेष्ठ साहित्यिक गुण वाला लेखक ही रख सकता है| संवाद के आधार पर ही पूरी कहानी कह दी गई। देखिए:
- समझ नहीं आता क्या किया जाए , सुबह के लिए मुट्ठी भर अनाज भी नहीं है|
- खुशनसीब हो यार| मैंने तो आज भी कुछ नहीं खाया|
बहुत – सी लघु कथाएंँ तो कथ्य का संपूर्ण कलेवर संवादों में ही पूर्ण कर देती हैं -निजाम , कहूँ कहानी , मांँएं और बच्चे , उसकी रोटी , हालात, शीशा, वजह आदि उसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं जिनमें मात्र संवाद ही सब कुछ समझा देते हैं।
महेश दर्पण जी ने ‘ कथादेश’ में साहित्यिक प्रेरणा दी कि वे सवाल दर सवाल नाम से अपना लघुकथा संग्रह छपवाना चाहते थे जिसे किसी वजह से वह तो पूरा ना कर सके परंतु कालांतर में भाटिया जी ने इसे साकार कर दिखाया है।
रमेश अधिक लिखने के कभी पक्षधर नहीं रहे। वे जो लिखते थे, बहुत सार्थक लिखते थे, यह स्पष्ट रूप में उजागर हो जाता है।
‘आलोचना-संसार’ में रमेश बत्तरा के निम्नलिखित पाँच दुर्लभ व संग्रहणीय आलेख भी पुस्तक को संग्रहणीय बना रहे हैं :
- लघुकथा नहीं
- लघुकथा : किसलिए और क्यों ?
- लघुकथा : संवेदना का सूत्र
- लघुकथा की साहित्यिक पृष्ठभूमि : संदर्भ और सरोकार :
- लघुकथा : बारीकी, सलीक़ा और करीना
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि कथाकार रमेश बत्तरा कौन हैं, उनकी लघुकथाओं का कलेवर और फ्लेवर कैसा है, यह जानने के लिए हर लघुकथा पाठक के पास इस पुस्तक का होना ‘ सोने पर सुहागा’ है।□
समीक्ष्य कृति : सवाल-दर-सवाल ( रमेश बत्तरा का लघुकथा साहित्य)
संपादक : अशोक भाटिया
प्रकाशक : भावना प्रकाशन, दिल्ली
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